Rig Veda - Book 01 - Hymn 063
Text: Rig Veda Book 1 Hymn 63 तवं महानिन्द्र यो ह शुष्मैर्द्यावा जज्ञानः पर्थिवीमे धाः | यद ध ते विश्वा गिरयश्चिदभ्वा भिया दर्ळ्हासः किरणा नैजन || आ यद धरी इन्द्र विव्रता वेरा ते वज्रं जरिता बाह्वोर्धात | येनाविहर्यतक्रतो अमित्रान पुर इष्णासि पुरुहूत पूर्वीः || तवं सत्य इन्द्र धर्ष्णुरेतान तवं रभुक्षा नर्यस्त्वंषाट | तवं शुष्णं वर्जने पर्क्ष आणौ यूने कुत्सायद्युमते सचाहन || तवं ह तयदिन्द्र चोदीः सखा वर्त्रं यद वज्रिन वर्षकर्मन्नुभ्नाः | यद ध शूर वर्षमणः पराचैर्वि दस्यून्र्योनावक्र्तो वर्थाषाट || तवं ह तयदिन्द्रारिषण्यन दर्ळ्हस्य चिन मर्तानामजुष्टौ | वयस्मदा काष्ठा अर्वते वर्घनेव वज्रिञ्छ्नथिह्यमित्रान || तवां ह तयदिन्द्रार्णसातौ सवर्मीळ्हे नर आजा हवन्ते | तव सवधाव इयमा समर्य ऊतिर्वाजेष्वतसाय्या भूत || तवं ह तयदिन्द्र सप्त युध्यन पुरो वज्रिन पुरुकुत्साय दर्दः | बर्हिर्न यत सुदासे वर्था वर्गंहो राजन वरिवः पूरवे कः || तवं तयां न इन्द्र देव चित्रामिषमापो न पीपयः परिज्मन | यया शूर परत्यस्मभ्यं यंसि तमनमूर्जं न विश्वध कषरध्यै || अकारि त इन्द्र गोतमेभिर्ब्रह्माण्योक्ता नमसा हरिभ्याम | सुपेशसं वाजमा भरा नः परातर मक्षू धियावसुर जगम्यात ||...